रवि और स्नेहा की मुलाकात कॉलेज के पहले दिन हुई थी। दोनों की दोस्ती जल्द ही गहरी हो गई और यह दोस्ती कब प्यार में बदल गई, उन्हें पता ही नहीं चला। रवि एक सीधा-सादा लड़का था, जबकि स्नेहा चंचल और जीवन से भरपूर थी। वे एक-दूसरे के बिना एक पल भी नहीं रह सकते थे।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। स्नेहा के माता-पिता ने उसकी शादी कहीं और तय कर दी। वह मजबूर थी, और रवि भी अपनी बेबसी में कुछ नहीं कर सका। आखिरी मुलाकात में स्नेहा ने कहा, “अगर पुनर्जन्म हुआ, तो मैं सिर्फ तुम्हारी ही होऊंगी।” रवि के आँखों में आंसू थे, लेकिन उसने स्नेहा को मुस्कुराकर विदा किया।
समय बीतता गया, लेकिन रवि के दिल में स्नेहा की यादें हमेशा जिंदा रहीं। वह प्यार को खोकर भी उसे जीता रहा। शायद यही सच्चा प्रेम था—बिना किसी स्वार्थ के, बिना किसी शर्त के।


