गौतम बुद्ध के समय में दो बड़े सम्राट थे —
राजा प्रसेनजित (कोशल देश) और राजा अजातशत्रु (मगध देश)।
दोनों राज्यों में एक लंबे समय से भूमि और सीमा विवाद चल रहा था, जो धीरे-धीरे युद्ध की ओर बढ़ने लगा।
राजा अजातशत्रु ने बुद्ध के शिष्य को बुलाया और कहा,
“मैं कोशल पर हमला करना चाहता हूँ। युद्ध से ही यह समस्या सुलझेगी!”
यह सुनकर शिष्य ने बुद्ध को सूचित किया।
बुद्ध स्वयं मगध और कोशल की सीमा पर आए और दोनों राजाओं को मिलने के लिए आमंत्रित किया। वहाँ उन्होंने शांति सभा आयोजित की।
सभा में बुद्ध ने दोनों राजाओं से पूछा:
“क्या तुम दोनों चाहते हो कि हजारों सैनिक मरें, गाँव जलें और माताएँ विधवा हों, सिर्फ इसलिए कि एक जमीन के टुकड़े पर झगड़ा है?”
बुद्ध ने आगे कहा:
“सच्चा सम्राट वह है जो जीत कर भी करुणा दिखाए, और अपने लोगों की रक्षा करे। यदि तुम भाई जैसे प्रेम से रहो, तो प्रजा भी सुखी रहेगी।”
राजा प्रसेनजित और अजातशत्रु ने एक-दूसरे की ओर देखा और शांत हो गए। दोनों ने बुद्ध के चरणों में प्रणाम किया और संधि की घोषणा की।
वहीं से कोशल और मगध की मित्रता की एक नई शुरुआत हुई।
संदेश:
बुद्ध ने यह सिखाया कि “विजय सबसे बड़ी तब होती है, जब वह बिना रक्तपात के हो।”
शांति सिर्फ युद्ध टालने के लिए नहीं होती, वह दिलों को जोड़ने का कार्य करती है। भाई-भाई का संबंध अगर प्रेम और समझ से चले, तो युद्ध की कोई आवश्यकता ही नहीं होती।


