
हर साल 21 मार्च को विश्व वन दिवस मनाया जाता है, ताकि जंगलों के संरक्षण और सतत प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके। भारत के हृदय में बसे छत्तीसगढ़ की पहचान इसके घने जंगल और समृद्ध आदिवासी संस्कृति से होती है। यहां के आदिवासी समुदाय पेड़ों को अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं, उनकी पूजा करते हैं, और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की परंपरा निभाते हैं।

लेकिन आज, छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य क्षेत्र खतरे में है। खनन के नाम पर यहां के सदाबहार जंगलों को निर्ममता से काटा जा रहा है, जिससे न केवल पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है, बल्कि उन आदिवासियों के अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा है, जो इन वनों के संरक्षक हैं।

नेता जब पर्यावरण संरक्षण की बातें करते हैं, तब सबसे पहले ऐसे आंदोलनों की आवाज सुनने की जरूरत है। पेड़ काटने की बजाय, “एक पेड़ काटें, दस लगाएं” की सोच अपनानी होगी। असली सम्मान तब होगा, जब पेड़ों को बचाने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
“पेड़ होंगे, तभी जीवन होगा।”


